पतंग

अकेली हो चुकी शामों से तंग आकर,
छूटी बातों के तारों को
जोड़ता हूँ मैं।
सोचता हूँ मैं,
हर एक पहलू
उस गुफ्तगू का।
तेरी गहराईयों में
हजारों मायने उधेड़ता हूँ मैं।
फिर थक के,
कटी पतंग सा
आज़ाद फिरता हूँ मैं।
और धूमिल होने का
इंतेज़ार करता हूँ मैं।

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